मंगलवार, 20 जनवरी 2026

मौनी अमावस्या 2026: प्रयागराज संगम पर ऐतिहासिक आस्था का सैलाब, करोड़ों श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी



मौनी अमावस्या 2026 के पावन अवसर पर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित त्रिवेणी संगम पर आस्था का ऐसा अद्भुत और ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर करोड़ों श्रद्धालुओं ने मौन व्रत रखते हुए पवित्र स्नान किया और पुण्य लाभ अर्जित किया। श्रद्धा, अनुशासन और भक्ति से ओतप्रोत यह महापर्व भारतीय सनातन परंपरा की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करता नजर आया।

मौनी अमावस्या का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन मौन व्रत धारण कर पवित्र नदियों में स्नान करने से आत्मशुद्धि होती है और सभी पापों का नाश होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मौनी अमावस्या के दिन संगम में स्नान करने से हजारों अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।

इस दिन साधु-संत, अखाड़ों के महंत, कल्पवासी और गृहस्थ श्रद्धालु प्रातःकाल से ही संगम तट पर जुटने लगते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और हर-हर गंगे के उद्घोष से पूरा प्रयागराज भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा।

संगम तट पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

मौनी अमावस्या 2026 पर संगम क्षेत्र में श्रद्धालुओं की संख्या ने सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में विदेशी भक्त भी इस अद्भुत आयोजन का साक्षी बने। श्रद्धालुओं ने ठंड की परवाह किए बिना ब्रह्म मुहूर्त से ही संगम में आस्था की डुबकी लगानी शुरू कर दी।

कल्पवासियों के टेंट सिटी, अखाड़ों के शिविर और श्रद्धालुओं की लंबी कतारें प्रयागराज को एक अस्थायी आध्यात्मिक नगरी में बदलती नजर आईं। महिलाएं, बुजुर्ग, युवा और बच्चे—सभी के चेहरे पर अद्भुत श्रद्धा और संतोष की झलक साफ दिखाई दी।

प्रशासनिक तैयारियां और सुरक्षा व्यवस्था

इतनी विशाल भीड़ को देखते हुए प्रशासन द्वारा व्यापक और सख्त इंतजाम किए गए थे। प्रयागराज मेला क्षेत्र को कई जोनों और सेक्टरों में बांटा गया। सुरक्षा के लिए हजारों पुलिसकर्मी, अर्धसैनिक बल, एनडीआरएफ और होमगार्ड तैनात किए गए।

ड्रोन कैमरों, सीसीटीवी और कंट्रोल रूम के जरिए पूरे मेले की निगरानी की गई। भीड़ प्रबंधन, यातायात नियंत्रण, चिकित्सा सुविधा, स्वच्छता और पेयजल की समुचित व्यवस्था ने प्रशासनिक तैयारी को सराहनीय बना दिया। किसी भी प्रकार की अव्यवस्था से बचने के लिए श्रद्धालुओं को लगातार लाउडस्पीकर और डिजिटल बोर्ड के माध्यम से दिशा-निर्देश दिए जाते रहे।

साधु-संतों और अखाड़ों की मौजूदगी

मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम तट पर विभिन्न अखाड़ों के साधु-संतों की उपस्थिति ने आयोजन को और भी दिव्य बना दिया। नागा साधुओं की टोली, योगी, संन्यासी और महामंडलेश्वर पूरे विधि-विधान से स्नान करते नजर आए। अखाड़ों के शिविरों में धार्मिक प्रवचन, भजन-कीर्तन और यज्ञ का आयोजन भी किया गया।

साधु-संतों ने इस अवसर पर समाज में शांति, सद्भाव और नैतिक मूल्यों को अपनाने का संदेश दिया। उनके अनुसार मौनी अमावस्या केवल स्नान का पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम और आत्मचिंतन का अवसर है।

स्वास्थ्य, स्वच्छता और सुविधा व्यवस्था

श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अस्थायी अस्पताल, मेडिकल कैंप और एंबुलेंस की व्यवस्था की गई थी। ठंड से बचाव के लिए अलाव, पेयजल, शौचालय और सफाई व्यवस्था को भी विशेष रूप से सुदृढ़ किया गया। स्वयंसेवी संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने भी सेवा भाव से श्रद्धालुओं की मदद की।स्वच्छता कर्मियों की दिन-रात मेहनत के कारण संगम क्षेत्र में साफ-सफाई बनी रही, जिसकी श्रद्धालुओं और प्रशासन दोनों ने सराहना की।

आस्था, संस्कृति और एकता का प्रतीक

मौनी अमावस्या 2026 का यह आयोजन केवल एक धार्मिक पर्व नहीं रहा, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकता और सनातन परंपरा की शक्ति का प्रतीक बनकर उभरा। अलग-अलग राज्यों, भाषाओं और वर्गों के लोग एक ही उद्देश्य से संगम तट पर एकत्रित हुए—आस्था की डुबकी लगाने के लिए।इस ऐतिहासिक अवसर ने यह सिद्ध कर दिया कि आधुनिकता के दौर में भी भारतीय समाज अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ है,मौनी अमावस्या पर प्रयागराज संगम में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब भारतीय आस्था की अमिट शक्ति को दर्शाता है। सुव्यवस्थित प्रशासन, अनुशासित श्रद्धालु और दिव्य वातावरण ने इस पर्व को ऐतिहासिक बना दिया। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए आस्था, संयम और सांस्कृतिक विरासत का प्रेरणास्रोत बना रहेगा।


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